yUnikowa, romanAgarI xOra saral hindI
Unicode, Romanaagarii and Saral Hindi
यूनिकोड, रोमनागरी और सरल हिन्दी

Hindi_Paathashaala
हिन्दी पाठशाला
Hindi Gita
हिन्दी गीता
Mahabharat
महाभारत
Tulasidas
तुलसीदास
Hindi Kavita
हिन्दी कविता
Unicode
यूनिकोड
Urdu Shaayarii
उर्दू शायरी
Romanaagarii
रोमनागरी
English
इँगलिश
Home Page
pahalA pannA
SrI vidyA

tulasIdAs
SrIrAmacaritamAnas

saral hindI lipi
hindI leKa
gIt-Zazal-saMgIt
hindI film gIt
romanAgarI pAQaSAlA
mahABArat
caritra xOr xaDyAya tAlikA
01-xAdi parv
02-saBA parva
03- vana parva

 04- virAq parva

 05-xudyog parva

 06-BIFma parva

 07-droNa parva

 08-karNa parva

 09-Salya parva

 10-SOptik parva

 11-strI parv

 12-SAnti parva

 13-xanuSAsan parva

 14-xASvameDik parva

 15-xASramavAsik parva

 16-mosal parva

 17-mahAprasTAnik parva

 18- svargArohaNa parva

आध्यात्मिक कवितायें


सूची

१-मैं कौन हूं?

२-वो कौन है?

३-विश्व-चेतना

४-श्री राम महिमा

५-दशावतार

६-दुर्गा भजन

७-सांई भजन

८-चार प्रेमिकायें मतवाली.

९-कोई नहीं सत्य का ग्यानी.

१०-मुझ को रूप दिखा दे अपना.

११-तू है कौन? बता दे मुझ को.

१२-दुनिया लगती है एक सपना.

१३-अब तो धूल मुझे प्यारी है.

१४-तेरा नूर हर तरफ़ छाया.

१५-मन से जीवन धन्य हमारा.

१६-अद्वैत

१७-वो कहां है?

१८-हम फ़रिश्ते बन गये

१९-तेरा जल्वा

२०-वक़्त की रफ़्तार

२१-जीवन धारा

२२-चांदनी

२३-फ़ासला

२४-दिव्य ज्योति

२५-ईश्वर प्रेम

२६-ईश्वर की क्रिपा

२७-आत्म-शक्ति

२८-ईश्वर को पाना

२९-एक और ज़ीरो

३०-ईश्वर की महानता

३१-थोड़ा समय

३२-ख़िज़ां

३३-कुंडलिनी

३४-वाक शक्तियां

३५-जीवन

३६-ईश्वर की खोज

३७-सूफ़ी की प्रेमिका

३८-बूंद और सागर

३९-भजन

४०-देवी की आरती

ऊपर


01

१-मैं कौन हूं?

वेद कहते हैं, अहम ब्रह्मास्मि, यानी ब्रह्म हूं मैं,
अनल हक़ कहते है सूफ़ी, जिसका मतलब, सत्य हूं मैं.

ब्रह्म एवम सत्य दोनों वास्तव में एक ही हैं,
सत्य के आधार पर ही ब्रह्म को पाता हूं मैं.

सूफ़ियों की और वेदों की कही सब बात सुनता,
उन्हीं बातों पर हमेशा अमल भी करता हूं मैं.

बुद्धि, तन, मन और आत्मा का बना बन्दा हूं मैं,
अहम का बन्दी हूं, जिससे बहुत शर्मिन्दा हूं मैं.

अहम के उस पार, ब्रह्म और सत्य का आवास है,
इसलिये आध्यात्मिकता की शरण लेता हूं मैं.

सर्वव्यापी ज्योति की एक टिमटिमाती किरन हूं मैं,
स्रिष्टि की बहती हुई धारा की छोटी लहर हूं मैं.

विश्वव्यापी चेतना का सूक्ष्म जीवन रूप हूं मैं,
इस अनंत आकाश में, कुछ भी नहीं, बस शून्य हूं मैं.
 

ऊपर


02

२-वो कौन है?

कौन यहां लाता है हम को? कौन यहां से ले जाता है?
कौन देखता यहां नज़ारे? कौन नज़ारे दिखलाता है?

कौन फूल कलियों में इत्नी सुन्दर्ता को भर देता है?
कौन बीज का पेड़ बनाकर, फल का बीज बना देता है?

कौन बात कहने से पहले, मतलब समझ रहा है उसका?
कौन याद रखता बातों को? कौन बात को दोहराता है?

कौन बहस में उलझाता है? कौन पहेली को सुलझाता?
कौन गणित सिखलाकर हम को भौतिक ग्यान सिखा देता है?

कौन देख कर दर्द किसी का, आंखों में भर लाता पानी?
कौन सुखी होता जब कोई, प्रेम किसी पर दिखलाता है?

कौन लगाता आग बदन में, पास कोई जब आ जाता है?
कौन आह ठन्डी भर्ता है, दूर कोई जब हो जाता है?

कौन जागता रहता है जब गहरी नींद में हम सोते हैं?
कौन देखता है स्वप्नों को? कौन स्वप्न को दिखलाता है?

कौन ज्योति की लहर दिखाता, आंख बन्द जब कर लेते हैं?
कौन ध्यान करने पर मन में, शान्ति और सुख भर जाता है?

इन सारे प्रश्नों का उत्तर, हमें बताया है सन्तों ने,
एक सत्य है सब के अन्दर, अनेक रूपों में आता है.
 

ऊपर


03

३-विश्व-चेतना

जग में हाहाकार मचा है, जग से हाहाकार मिटा दे,
विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे.

तेरा अंश सनातन, प्राणी बनकर इस जगती में आता,
आती मौत समाता तुझ में, लेकिन प्राणी है घबराता,
तेरा आने जाने का चक्कर लोगों की समझ न आता,
सब तुझ से पैदा, तुझ में मिल जाते, यह रहस्य समझा दे.
विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे.

आंखें चकाचोंध कर दें, एसे रंगीनी रूप दिखाये,
आसमान को छूने वाले, इस धरती पर महल बनाये,
रंग मिटाने, महल गिराने, मानवता के दुश्मन आये,
मानवता की रक्षा करना सबका धर्म, इसे बतला दे.
विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे.

शान्ति और सुख पाने को हम सबकी आत्मा भ्टक रही है,
करते भोग-विलास किन्तु मिलता उसमें सन्तोष नहीं है,
जीवन उलझ रहा आपाधापी में, जिसका अन्त नहीं है ,
क्या हैं सच्चे शान्ति और सुख, इसका सबको ग्यान करा दे.
विश्व-चेतना! मानवता की व्याकुलता को दूर करा दे.

ऊपर


04

४-श्री राम महिमा

ले अवतार धरा पर तुम ने, जगती का उद्धार किया था,
धन्य! धन्य! हे राम! धन्य है! तुमने सबको प्यार दिया था.

आग्या मान पिता की तुम ने, त्याग दिया था सिंहासन भी,
सीता, लक्ष्मण के संग पैदल, वन जाना स्वीकार किया था.

केवट ने अपनी नैया पर, नदिया पार कराई केवल,
उस के बदले में केवट को, भव सागर से पार किया था.

मौन पड़ी प्रतिमाओं पर भी, दया द्रिष्टि डाली थी तुम ने,
पत्थर पड़ी अहिल्या छूकर, उसे श्राप से तार दिया था.

बन वासी लोगों को तुम ने, गले लगाकर अपनाया था,
खाकर जूठे फल, शबरी को, एक अनोखा प्यार दिया था.

कितना दानव था एक मानव, सिया हरण ने दिखलाया था,
मानवता की रक्षा करने, वानर दल तैयार किया था.

जिन्हें राक्षसों ने तड़्पाया, उन पर तुमने दया दिखाई,
मुक्ति जटायू को दी जिस का, रावण ने पर काट दिया था.

पवन पुत्र के साथ, गगन में चलना कठिन नहीं था लेकिन,
नील और नल के पुल पर ही, चलकर सागर पार किया था.

रावण बध के बाद आप ही, लंका नरेश बन सकते थे,
किन्तु विभीषण को ही तुमने, लंका का सब राज दिया था.

वन से लौट दिखाया तुमने, प्रजा प्रेम का रूप अनोखा,
जन साधारण के कहने पर, सीता को बनवास दिया था.

ऊपर


05

५-दशावतार

हर युग में विकास दर्शाने, तुमने समुचित रूप धरे,
धन्य! धन्य हे विष्णु देवता! जय, जय, जय जगदीश हरे!

प्रिथ्वी जब समुद्र थी सारी, जीवन था केवल जल में,
मछली बन पानी पर तैरे, जय, जय, जय जगदीश हरे!

धरती प्रगट हुई पानी से, जीव जन्तु बाहर आये,
कछुआ बन जल थल पर छाये, जय, जय, जय जगदीश हरे!

हरियाली उगने के संग ही, पशुओं का भी जन्म हुआ,
शूकर बन जंगल में घूमे, जय, जय, जय जगदीश हरे!

पशुओं में मानवता के कुछ चिन्ह लगे विकसित होने,
नरसिंह में दो रूप समाये, जय, जय, जय जगदीश हरे!

सब से पहला रूप मनुज का, भूमण्डल पर जब आया,
अति लघु वामन बन कर आये, जय, जय, जय जगदीश हरे!

आदि काल का मानव निर्भय, वन में विचरण करता था,
परशुराम का रूप वही था, जय, जय, जय जगदीश हरे!

राक्षस जब बढ़ गये जगत में, शान्ति सुरक्षा भंग हुई,
मानव रक्षक राम बने तुम, जय, जय, जय जगदीश हरे!

मुक्ति के लिये भक्ति, ग्यान के साथ कर्म की चाह बढ़ी,
क्रिष्ण रूप योगेश्वर आये, जय, जय, जय जगदीश हरे!

मानवता ने दुख से बचने, जब चाहा निर्वाण मिले,
बन कर बुद्ध शरण दी सब को, जय, जय, जय जगदीश हरे!

कलयुग में कल के बल पर ही, चलता है जीवन सारा,
अब तुम कलकी बन कर आये, जय, जय, जय जगदीश हरे!

करने को उद्धार जगत का, ईश धरा पर हैं उतरे,
अब तक दस अवतार लिये हैं, जय, जय, जय जगदीश हरे!

ऊपर


06

६-दुर्गा भजन

दुर्गा मां! तेरे गुण गायें,
अपने दुख, संताप मिटायें. दुर्गा मां!...

कितनी प्यारी सूरत तेरी,
मन, मन्दिर में उसे सजायें. दुर्गा मां!...

शेर सवारी करने वाली,
देख तुझे निर्भय हो जायें. दुर्गा मां!...

नौ अंकों के साथ शून्य को,
तेरे दस हाथों में पायें. दुर्गा मां!...

बेड़ा पार लगा दे सबका,
तेरे आगे शीश नवायें. दुर्गा मां!...

ऊपर


07

७-सांई भजन

आओ सांई के गुण गायें.
उस पर अपना ध्यान लगायें.

जिस से जगमग है जग सारा,
वही ज्योति आंखों में लायें.

जिस बगिया में सुगन्ध उस की,
फूल वहीं से चुनकर लायें.

सत्य नदी वह सबसे गहरी,
उस की धारा में बह जायें.

जो सुख, दुख देता जीवन में,
उस से शान्ति निरन्तर पायें.

ऊपर


08

८-चार प्रेमिकायें मतवाली.

पहली लाल भेस में आती,
महकाती, संगीत सुनाती,
भरी नींद से मुझे जगाती,
ऊषा की है शान निराली,
चार प्रेमिकायें मतवाली.

दूजी का बस बाहर रहना,
धूप ताप में सब कुछ सहना,
झांक खिड़्कियों से कुछ कहना,
किरण करे दिन भर रखवाली,
चार प्रेमिकायें मतवाली.

तीजी का सज-धज कर आना,
दीप जलाना, धुंआ उड़ाना,
भोज कराकर सेज सजाना,
संध्या लाती मधु की प्याली,
चार प्रेमिकायें मतवाली.

चौथी काला चोगा पहने,
जिस पर हैं चमकीले गहने,
आती प्यार की बातें कहने,
निशा मेरे संग सोने वाली,
चार प्रेमिकायें मतवाली.

ऊपर


09

९-कोई नहीं सत्य का ग्यानी.

दीन-धर्म की होड़ लगाई,
पूरी बात समझ नहीं आई,
क्या असली क्या नकली भाई,
सच्चाई किसने है जानी?
कोई नहीं सत्य का ग्यानी.

पोथी पढ़ कर सब ने देखा,
मिलता नहीं भाग्य का लेखा,
आख़िर पढ़ी काल की रेखा,
जिस से अपनी क़िस्मत जानी,
कोई नहीं सत्य का ग्यानी.

सब संसार छोड़ कर भागे,
कोई पीछे, कोई आगे,
कभी न आये लौट, अभागे,
जो बतलाते मौत के मानी,
कोई नहीं सत्य का ग्यानी.

ऊपर


10

१०-मुझ को रूप दिखा दे अपना.

औरों से ही तुझे सुना है,
फिर भी तुझ को सदा गुना है,
तुझको देखूं, यह सपना है,
पूरा कर दे मेरा सपना,
मुझ को रूप दिखा दे अपना.

आजा तू मेरे आंगन में,
हरे भरे सुन्दर उपवन में,
बस जा मेरे निर्मल मन में,
तुझ में देखूं चहरा अपना,
मुझ को रूप दिखा दे अपना.

मैं तुझ को जब पा जाउंगा,
ऊंचा बहुत चला जाउंगा,
बादल बन कर छा जाउंगा,
चाहूंगा जगती पै बरसना,
मुझ को रूप दिखा दे अपना.

ऊपर


11

११-तू है कौन? बता दे मुझ को.

तू था, जब कुछ यहां नहीं था,
नहीं जगह, तू जहां नहीं था,
फिर भी तेरा पता नहीं था,
अब तो पता बता दे मुझ को,
तू है कौन? बता दे मुझ को.

रात में तारे क्यों आते हैं?
दिन में कहां चले जाते हैं?
नभ पर कैसे मंडराते हैं?
ये रहस्य समझा दे मुझ को,
तू है कौन? बता दे मुझ को.

यही चाहता सांझ सवेरे,
पाऊं असली रूप को तेरे,
अगर पास आ सके न मेरे,
अपने पास बुला ले मुझ को,
तू है कौन? बता दे मुझ को.

ऊपर


12

१२-दुनिया लगती है एक सपना.

आकर यहां, चले जाना है,
कुछ भी साथ न ले जाना है,
अन्त समय सब ने माना है,
कोई नहीं यहां पर अपना,
दुनिया लगती है एक सपना.

अंधियारे में भटक रहे हैं,
शब्द ग्यान पर अटक रहे हैं,
एक-दूजे को झटक रहे हैं,
जो मिल जाये उसे लपकना,
दुनिया लगती है एक सपना.

यह सपना है फिर भी अच्छा,
इस से अलग नहीं कुछ सच्चा,
जग का बन्धन चाहे कच्चा,
फिर भी मन को यहीं भटकना,
दुनिया लगती है एक सपना.

ऊपर


13

१३-अब तो धूल मुझे प्यारी है.

अणु की धूल जगत में छाई,
अणु में परमाणु की समाई,
समझ हमें यह विद्या आई,
ब्रह्माण्ड में धूल सारी है,
अब तो धूल मुझे प्यारी है.

सभी रंगों में धूल भरी है,
धूल हवा में भी बिखरी है,
धूल से धरती हरी भरी है,
धूल से गुलशन हर क्यारी है,
अब तो धूल मुझे प्यारी है.

काया एक दिन धूल बनेगी,
धूल से सब की सेज सजेगी,
अन्त समय बस धूल उड़ेगी,
जीवन की यह गति न्यारी है,
अब तो धूल मुझे प्यारी है.

ऊपर


14

१४-तेरा नूर हर तरफ़ छाया.

सफ़ेद हो चोटी बर्फ़ीली,
या सहरा की धूल हो पीली,
या सागर की लहरें नीली,
सब में तेरा रंग समाया,
तेरा नूर हर तरफ़ छाया.

तुझ से ख़ुश हर इन्सां का दिल,
तुझ से सारे फूल रहे खिल,
तेरे बिन सूनी हर महफ़िल,
तूने सारा रंग जमाया,
तेरा नूर हर तरफ़ छाया.

जिस ने तुझ को जान लिया है,
उस ने यह भी मान लिया है,
जो कुछ भी इन्सां ने किया है,
उस के ऊपर तेरा साया,
तेरा नूर हर तरफ़ छाया.

ऊपर


15

१५-मन से जीवन धन्य हमारा.

मन दिन रात जागता रहता,
सुख, दुख सारे मन ही सहता,
मन ही सुनता, मन ही कहता,
मन में बहती जीवन धारा,
मन से जीवन धन्य हमारा.

मन ही सब विग्यान सिखाये,
मन ही सारे यन्त्र बनाये,
मन में ही सब मन्त्र समाये,
मन में ग्यान समाया सारा,
मन से जीवन धन्य हमारा.

शरीर मन को जकड़ न पाये,
काल भी मन को पकड़ न पाये,
मन सब लोकों में भरमाये,
मन से जाना ब्रह्माण्ड सारा,
मन से जीवन धन्य हमारा.

ऊपर


16

१६-अद्वैत

डर नहीं मुझको दुनिया में कुछ खोने या रुसवाई का,
तुझको पाकर डर है तो बस वो है तेरी जुदाई का.

दर्द, दुखों में तेरी चाहत, और ज़रूरत कोई नहीं,
तुझको पा लूं, यही दवा है, काम न और दवाई का.

साथी सारे जुदा हो गये, छोड़ अकेला राहों में,
मेरी नज़र पड़ी जब तुझ पर, ग़म न रहा तनहाई का.

तेरे करम से देखे सारे, जलवे प्यारे, रंग भरे,
तेरी दुआ से पाया हमने, सारा राज़ ख़ुदाई का.

तू ही तू है समा रहा, सब जीवों में, हर ज़र्रे में,
कुछ भी दूजा नहीं यहां पर, सारा खेल इकाई का.

ऊपर


17

१७-वो कहां है?

पैदा जिसने हमें किया, वो रहता हमसे दूर है कयों?
मिलना जिसका होवे आसां, मिलने से मजबूर है क्यों?

हस्ती सबकी एक दरिया है, बूंद कहो या लहर कहो,
पानी का जब सारा आलम, वीरानी भरपूर है क्यों?

ऐश यहां जब मिलते है सब, हुस्न, शबाब के साये में,
फिर इस मन को तरसती जो, आसमान की हूर है क्यों?

इस दुनिया के सभी नज़ारे, आंख के आगे परदा है,
इस पर्दे के पीछे असली, छुपा ख़ुदा का नूर है क्यों?

दीख रहा जो, दिखा रहा वो, दोनों हैं मौजूद सदा,
पल दो पल को देख रहा यह इन्सां फिर मग़रूर है क्यों?

ऊपर


18

१८-हम फ़रिश्ते बन गये

इस जहां में, जब बुतों के रिश्ते कच्चे बन गये,
रिश्ता एक पक्का बनाने, हम फ़रिश्ते बन गये.

जब तलक चाहत रही, ग़म हमेशा बढ़ते रहे,
ग़म की जड़, चाहत, मिटाने, हम फ़रिश्ते बन गये.

ज़मीं पर दुख सहते-सहते, ख़ाक़ में मिल जायेंगे,
आसमां का मज़ा पाने, हम फ़रिश्ते बन गये.

मज़हबों का भूत देखा, भूत से हम डर गये,
भूत से ख़ुद को बचाने, हम फ़रिश्ते बन गये.

जिसने पैदा किया, उससे दूर हम हरदम रहे,
उस ख़ुदा के पास रहने, हम फ़रिश्ते बन गये.

ऊपर


19

१९-तेरा जलवा

देख के तेरा जलवा, सबने अपने दिल को थाम लिया,
मैंने भी तो सब कुछ तजकर, बस तेरा ही नाम लिया.

तेरे नूर की चकाचौंध ने, मस्त कर दिया था मुझको,
और न कोई नशा किया, बस तेरे नूर का जाम पिया.

तूने सब कुछ दिया मुझे, मैं तुझको कुछ भी दे न सका,
तेरा क़र्ज़दार रहने का, मैंने अब इल्ज़ाम लिया.

आस लगाए बैठे हैं सब, कब मिलना होगा तुझसे,
मैं भी इसी आस में बैठा, कुछ भी ना आराम किया.

अनजानी राहों पर मुझको, काम बहुत ही कठिन मिले,
मज़बूरी थी, नहीं किया, जो तूने मुझको काम दिया.

ऊपर


20

२०-वक़्त की रफ़्तार

देख कर वक़्त की रफ़्तार सहम जाते हैं,
अपनी छोटी सी ज़िन्दगानी पर शरमाते हैं.

इरादे कितने किये थे, बहुत कुछ करने के,
कुछ न कर पाये, यह अहसास कर, पछताते हैं.

बहारें आईं और चली गईं, पता न चला,
ख़िज़ां के आने पर ना जाने क्यों घबराते हैं.

कभी देखे थे यहां, ज़िन्दगी में ख़्वाब रंगीं,
अब तो बस ख़्वाब में ही ज़िन्दगी को पाते हैं.

तराने इश्क़ के गाये तो दर्द और बढ़ा,
इसलिए हम ये सूफ़ियाने गीत गाते हैं.

ऊपर


21

२१-जीवन धारा

एक कली ने हमें चमन की बहार का पैग़ाम दिया,
वहीं पेड़ की छांव में हम ने थोड़ा सा आराम किया.

फूलों की थी रौनक़ लेकिन हम उन से कुछ दूर रहे,
देखा जब अपने छालों को, कांटा हाथ में थाम लिया.

यादों की जो सौगातें थीं, ख़ुशियां भी थीं, ग़म भी थे,
ख़ुशियों को हम कहां सजाते? ग़म को दिल से बांध लिया.

सोचा शायद सुकूं मिले जो ज़हन करे दिल पर क़ाबू,
इल्म दर्द को कम न कर सका, उसे दूसरा नाम दिया.

दुनिया के सब लोग हमें तो आईने की तरह लगे,
अन्दर क्या है? उसे न जाना, बाहर क्या? सच मान लिया.

हाल हमारा देखने वाले, ग़ैर भी थे, अपने भी थे,
ग़ैरों ने कुछ तरस दिखाया, अपनों ने बदनाम किया.

आख़िर हम को राह दिखाई, नूर-ए-बेख़ुदी ने एक दिन,
अपने अन्दर जो बैठा था, उसे रहनुमा मान लिया.

ऊपर


22

२२-चांदनी

चांदी जैसा बदन मेरा, मैं दूर से चल कर आई हूं,
परी लोक से रात समय, मैं तुझसे मिलने आई हूं.

दरवाज़े थे बन्द मगर, देखा खिड़्की है खुली हुई,
इसी लिये छुप कर तुझ तक, खिड़्की से होकर आई हूं.

सब हैं गहरी नींद में सोये, सपनों में वो हैं खोये,
नहीं किसी के जगने का डर, किसी से ना घबराई हूं.

प्यार दिखाती हूं सब पर, मैं सब को गले लगाती हूं,
शर्म किसी से नहीं मुझे, मैं इसी लिये हरजाई हूं.

पास रहूंगी लेकिन तुझको नींद से नहीं जगाऊंगी,
रात बिताने तेरे संग, मैं चांदनी बन कर आई हूं.

ऊपर


23

२३-फ़ासला

फ़ासला इन्सान का इन्सान से क्या चाहिये?
इसे बतलायेंगे, पहले, उनमें फ़र्क़ दिखाइये.

एक है मन्ज़िल सभी की, रहगुज़र भी एक है,
फिर सफ़र में फ़ासला, क्योंकर बढ़ाना चाहिये?

चमन को ही देखिए, उससे भी तो कुछ सीखिए,
दूरियां उतनी रखो, जितनी गुलों में पाइये.

सभी रूहों में अगर, नूर-ए-ख़ुदाई एक है,
ख़ुदा से जो फासला, इन्सां से उतना चाहिये.

मौत आने पर तो मिट जाता है इन्सानों का फ़र्क़,
ज़िन्दगी को मौत से कुछ सबक़ लेना चाहिये.

ऊपर


24

२४-दिव्य ज्योति

तेरे प्रेम में सब कुछ पाया, किसी चीज़ की कमी नहीं,
ईश्वर! तेरी ज्योति के आगे, कोई रोशनी जमी नहीं.

तेरे दम से सभी सूरतें, सभी सूरतों में तू है,
और भी एसा कहने वाले, यह कहते बस हम ही नहीं.

समा गया दिल, दिमाग़ में तू, आत्मा में भी तू बसता,
करना तेरा ध्यान छोड़ दें, हमसे होगा कभी नहीं.

तेरे बिना नहीं सुख कोई, चाहे सभी दौलतें हों,
तुझको पा ले, वही धनी है, उससे बढ़कर धनी नहीं.

तेरे पास रहूं मैं हरदम, और नहीं ख़्वाहिश कोई,
तेरे साथ शान्ति-सुख मुझको, और शान्ति-सुख कहीं नहीं.

ऊपर


25

२५-ईश्वर प्रेम

प्रेम में तेरे हुए दिवाने,
दुनिया से हो कर बेगाने.

सबने अपने गीत सुनाये,
हमने गाए तेरे तराने.

कैसे मिटायें, अपनी हस्ती,
जाना, जब देखे परवाने.

जब मन में अंधियारा छाया,
आंखें मूंदीं ज्योति जगाने.

पाना तुझको सरल नहीं था,
सब जग त्यागा, तुझको पाने.

ऊपर


26

२६-ईश्वर की क्रिपा

जब से मैंने तुझको पाया,
मैं तो हूं बस तेरा साया.

कितनी दूरी, पता चल गया,
अहम से डका तुझको पाया.

तेरे नाम ने दी है राहत,
दुनिया ने जब मुझे सताया.

अन्त समय मिट्टी बन जाती,
कितनी कच्ची है यह काया.

जिस पर तेरी क्रिपा हो गई,
सच्चा नूर उस ने पाया.

ऊपर


27

२७-आत्म-शक्ति

जिस्म की कमज़ोरी मैंने जान ली,
आत्मा की शक्ति भी पहचान ली.

लोग हैं मुझ से ख़फ़ा अब किस लिये?
जब कि मैंने बात सबकी मान ली.

सबक़ छालों को मिले, बस इस लिए,
दोस्ती कांटों से करनी ठान ली.

चैन दुनिया में कहीं मिलता नहीं,
सारी दुनिया तो है मैंने छान ली.

साथ दे जो हर जगह तनहाई में,
अपने अन्दर वो परी पहचान ली.

ऊपर


28

२८-ईश्वर को पाना

ईश्वर को पा सब सुख पाते,
दुख के साये पास न आते.

आसानी से वक़्त गुज़रता,
उसकी महिमा के गुण गाते.

बादल, बिजली, गरज गगन में,
उसकी ही छवि को दिखलाते.

वो ही देता चैन सभी को,
दर्द और ग़म जब तड़पाते.

उस को पाकर इस जीवन में,
सभी संकटों से बच जाते.

ऊपर


29

२९-एक और ज़ीरो

तू है एक और मैं ज़ीरो, किसे समझ यह आयेगा?
इसको जो समझेगा, उसको पूर्ण ग्यान हो जायेगा.

तेरे संग मिलकर रहना ही मुझको शक्ति दिलाता है,
रहकर तुझसे अलग, मेरा अस्तित्व न रहने पायेगा.

तेरे अंदर मेरे जैसे, अनगिन शून्य समा जायें,
मेरे अन्दर तेरा तो एक हिस्सा भी न समायेगा.

एक, शून्य के भेद को पंडित, ग्यानी भी न समझ पाये,
लेकिन इनसे कम्प्यूटर अब चमत्कार दिखलायेगा.

हम दोनों में मेल रहे तओ काम बहुत बन जायेंगे,
दोनों में से एक न हो तो खेल ख़त्म हो जायेगा.

ऊपर


30

३०-ईश्वर की महानता

चांदनी बन रात में जब नूर आया,
हम ने माना चांद में भी तू समाया.

गुलों में तेरे ही रंग, तेरी ही ख़ुशबू,
चमन में जलवा तेरा सब ओर छाया.

जिन्हें इन्सां तो बना सकता नहीं है,
उन बड़े दरियाओं को तूने बनाया.

परी चेहरों में भी तेरी झलक देखी,
हुस्न सारा उन्होंने तुझसे ही पाया.

हर तरफ़ फैला तेरा जब नूर देखा,
लगा फीका, दीप जो हमने जलाया.

ऊपर


31

३१-थोड़ा समय

आयेगी पतझड़ तो होगा चमन वीरां, एक दिन,
फूल, कलियों की जगह कांटे मिलेंगे, एक दिन.

जो भी करना जलद कर लो, वक़्त गुज़रा जाये है,
जो न कर पाये तो पछताना पड़ेगा, एक दिन.

आईने में देख लो, कुछ देर अपने जिस्म को,
ख़ाक में या राख में, यह जिस्म होगा, एक दिन.

आशियां ख़स्ता हमारा, हमको लेकिन है सुकूं,
महल भी हो जाते हैं खंडहर यहां पर, एक दिन.

मुलाक़ाते मुख़्तसिर को भी ग़नीमत जानिये,
ख़्वाब ही रह जायगा, इतना भी मिलना, एक दिन.

ऊपर


32

३२-ख़िज़ां

अय ख़िजां तू आ रही, कलियां सभी मुरझायेंगी,
महकती हैं जो चमन में, ख़ाक़ में मिल जायेंगी.

जिस किसी को नाज़ अपने जिस्म पर, उससे कहो,
कुछ दिनों के बाद इस पर, झुर्रियां पड़ जायेंगी.

गुज़र जायेगी जवानी, चन्द दिन की बात है,
हुस्न की सब रौनक़ें, एक ख़्वाब ही रह जायेंगी.

ख़ुशी के गा लो तराने, जब तलक हैं सफ़र में,
पहुंच कर मंजिल पे उनकी, गूंज ही रह जायेंगी.

मौत ही दिखलायेगी अब, मसीहाई का कमाल,
जब ये आंखें बन्द होंगी, जहां की खुल जायेंगी

ऊपर


33

३३-कुंडलिनी

तनहाई में तू आई है, अब क्या ग़म तनहाई का,
मेरी आंखों में छाया है, नशा तेरी अंगड़ाई का.

फूलों की ख़ुशबू में तू है, तू है गीतों के सुर में,
हर मुक़ाम पर मिलती मुझको, शुक्र है तेरी वफ़ाई का.

तुझको कोई देख सके ना, तुझे कोई ना रोक सके,
अब न किसी की नज़र का डर है, और न डर रुसवाई का.

रंज मिलेंगे, मुझको डर था, दर्द सा दिल में होता था,
सारे डर अब दूर हुए, बस डर है तेरी जुदाई का.

दुआ यही, जब तक जिंदा हूं, तब तक तेरा साथ रहे,
और ख़ुदा से क्या मांगू मैं? पा लिया राज़ ख़ुदाई का.

ऊपर


34

३४-वाक शक्तियां

वाणी द्वारा विचार का आदान प्रदान जहां होता,
चार तरह की वाक शक्तियों द्वारा संचालित होता.

सबसे पहली परा वाक का रूप अलौकिक होता है,
नाद-बिन्दु या ब्रह्म-नाद उससे ही पैदा होता है.

मन में नये विचारों की प्रेरणा जब कभी मिलती है,
समझो उसके पीछे कोई वाक शक्ति पश्यन्ती है.

अपने विचार को भाषा में परिवर्तित जब करते हैं,
मस्तिष्क में गठन उसका मध्यमा शक्ति से करते हैं .

मन की बातें कहने को जब मुंह से शब्द निकलते हैं,
उसके पीछे वाक शक्ति है जिसे वैखरी कहते है.

ऊपर


35

३५-जीवन

जीवन तो शतरंज है, मानव हैं बस गोट,
रात-दिनों के बोर्ड पर , खाते रहते चोट.
खाते रहते चोट, उदासी इस से होती,
नियति खिलाती खेल, हार मानव की होती.
कह ज़ीरो कविराय, खेल में जीवन बीता,
खाईं सब ने मातें, कोई भी ना जीता.

ऊपर


36

३६-ईश्वर की खोज

जैसे सूरज में बसे, जग के सभी प्रकाश,
ईश्वर के अन्दर बसे, सब धर्ती, आकाश.
सब धर्ती, आकाश, उन्हें विवेक से जाना,
जिसने उन्हें बनाया, उसे नहीं पहचाना.
कह ज़ीरो कविराय, बुद्धि से ईश्वर पाना,
जैसे दीपक से सूरज की खोज कराना.

ऊपर


37

३७-सूफ़ी की प्रेमिका

अजीब मेरी प्रेमिका, वार करे अति क्रूर,
बद्ले अपने रूप को, लगे अटपटी हूर.
लगे अटपटी हूर, मुझे अचरज है भारी,
कैसे रक्खूं मेल, बड़ी चंचल यह नारी.
कह ज़ीरो, जब सोऊं, बहुत दूर हो जाती,
जब देखूं उठ जाग, मेरा अस्तित्व मिटाती.

ऊपर


38

३८-बूंद और सागर

सागर में बूंदें बसीं, उन का आदि न अंत,
बूंदों में सागर बसा, कहते हैं यह संत.
कहते हैं यह संत, भेद दोनों में ऐसा,
आत्मा, परमात्मा में अन्तर होता जैसा.
कह ज़ीरो, परमात्मा को आत्मा में पाते,
जैसे बूंदों द्वारा सागर देखे जाते.

ऊपर


39

३९-भजन

इस दुनिया में आकर एक दिन सब को जाना है,
बात सरल है पर मुश्किल इस को समझाना है.

छोटी सी ज़िन्दगानी, उस पर अभिमानी होना,
दुनिया को इस नादानी का ग्यान कराना है.

नेक काम जो करने, उन को जलदी ही कर लें,
समय निकल जाने पर तो केवल पछताना है.

दुख के एक गहरे सागर में सब हैं डूब रहे,
बीच भंवर से अपनी नैया पार लगाना है.

जीवन में हम सुख पायें, कुछ शान्ति मिले मन को,
कर्म, ग्यान, भक्ती में अपना ध्यान लगाना है.

ऊपर


40

४०-देवी की आरती

श्री विद्या, आत्मा, गायत्री, सरस्वती, ललिता;
देवी, सरस्वती, ललिता;
गौरी, शान्ता, माया, दुर्गा, श्री माता;
देवी, दुर्गा, श्री माता.

श्री विद्या, तेरे निवास का, यन्त्र बनाया है;
देवी, यन्त्र बनाया है;
भाषा, लिपि का उसमें, ग्यान समाया है;
देवी, ग्यान समाया है.

तू आत्मा, तू सब के अन्दर, तू ही;
देवी, तू ही परमात्मा;
यह रहस्य, पर सच है, सब हैं एक आत्मा;
देवी, सब हैं एक आत्मा.

गायत्री, तूने जगती में, भक्ति जगाई है;
देवी, भक्ति जगाई है;
देकर मन्त्र हमारी, शक्ति बढ़ाई है;
देवी, शक्ति बढ़ाई है.

सरस्वती, तेरी वाणी में, हमको गीत मिले;
देवी, हमको गीत मिले;
वीणा के तारों में, सुर, संगीत मिले;
देवी, सुर सुर, संगीत मिले.

ललिता, तेरा रूप सलोना, सबको है भाता;
देवी, सबको है भाता;
देख तुझे विकलित मन, हर्षित हो जाता;
देवी, हर्षित हो जाता.

गौरी, तेरी आभा में सब, रूप-रंग पाते;
देवी, रूप-रंग पाते;
सूर्य, चन्द्र, तेरा ही, प्रकाश दिखलाते;
देवी, प्रकाश दिखलाते.

शान्ता बनकर तू ही सबको, शान्ति प्रदान करे;
देवी, शान्ति प्रदान करे;
तेरे सौम्य रूप में, सब आनन्द भरे;
देवी, सब आनन्द भरे

तू माया, सारी माया को, तूने रचित किया;
देवी, तूने रचित किया;
माया-जाल बिछाकर, सबको चकित किया;
देवी, सबको चकित किया.

तू दुर्गा, तू पास रहे तो दुख न पास आये;
देवी, दुख न पास आये;
शत्रु देखकर तुझको, दूर भाग जाये;
देवी, दूर भाग जाये.

श्री माता, तेरी गोदी में, सब सुख पाते हैं;
देवी, सब सुख पाते हैं;
दे वरदान निरन्तर, शीश नवाते हैं;
देवी, शीश नवाते हैं.

श्री विद्या, आत्मा, गायत्री, सरस्वती, ललिता;
देवी, सरस्वती, ललिता;
गौरी, शान्ता, माया, दुर्गा, श्री माता;
देवी, दुर्गा, श्री माता.

ऊपर


Home Page
pahalA pannA
कॄपया यहां क्लिक कीजिये और ई-मेल द्वारा अपने विचार भेजिये
Please click here and Email your views/comments