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ज़ीरो की रुबाइयां
१
दिल
में
आग
लगी
हैं,
धुंआ
नज़र
आयेगा,
इसके
अंदर
आने
वाला,
जल
जायेगा,
हो
गए
हैं
तेज़ाब,
हमारी
आंख
के
आंसू,
इनको
पोंछोगे
तो
आंचल
गल
जाएगा.
२
अंधियारे
में
तुमने
दिया
जलाकर
छोड़ा,
उजड़े
चमन
में
रंगीं
फूल
खिलाकर
छोड़ा,
बहुत
कहा,
पत्थर
है,
दिल
मेरा
सीने
में,
तुमने
पत्थर
दिल
को
भी
पिघला
कर
छोड़ा.
३
ज़िन्दगानी,
उसे
तो
सुनसान
नज़र
आती
हैं,
ज़मीं
सारी
उसे
तब
वीरान
नज़र
आती
है,
एक
तस्वीर
से
आबाद
हो
जिसकी
दुनिया,
वो
ही
तस्वीर
जब
हैवान
नज़र
आती
है.
४
वतन
पर
मिटे
जो,
उनका
तो
ऊंचा
नाम
हैं,
बनाना
वतन
को
मज़बूत,
अच्छा
काम
है,
करे
कमज़ोर
जो
इन्सां
वतन
को,
कहीं
भी,
उससे
ख़तरा
है
वतन
को,
वो
भी
बदनाम
है.
५
चमन
के
फूल
सारे,
मैं
तेरी
झोली
में
भर
दूं,
आसमां
के
सितारे,
मैं
तेरी
ज़ुल्फ़ों
में
जड़
दूं,
मेरी
वीरान
दुनिया
में
बहारें
लाने
वाले,
जहां
की
दौलतें
सारी,
तेरे
क़दमों
पे
धर
दूं.
६
न
दिन
में
ख़्याल
की
चाहत,
न
ख़्वाब
आने
की
रातों
मैं,
सुबह
से
शाम
होकर
फिर
सुबह
होती
है
बातों
में,
रहें
होती
मुलाक़ातें,
ये
दोनों
को
तसल्ली
है,
सुकूं
है
उनकी
आंखों
में,
ख़ुशी
है
मेरे
हाथों
में.
७
इश्क़
वालों
की
मिसालों
की
कहीं
कमी
नहीं,
इश्क़
के
खेल
में
दौलत
तो
कहीं
जमी
नहीं,
इश्क़
में
जान
की
भी
लगानी
पड़ती
है
बाज़ी,
इश्क़
का
खेल
है
शतरंज,
ताश
की
रमी
नहीं.
८
तबादले
पर
एक
जगह
से
जब
कभी
जाते
हैं
हम,
घर
का
सब
सामान,
अपने
साथ
बंधवाते
हैं
हम,
जाना
जैसे
मौत
है,
फिर
लौटकर
नहीं
आयेंगे,
फ़िर
भी
बोझा
अपने
कंधों
पर
ही
लदवाते
हैं
हम.
९
गुलिस्तां
वो
बने
जिसमें
ख़ुशी
का
फूल
खिले,
एसी
ताक़त
करें
पैदा
की
आसमां
भी
हिले,
क्यों
न
जन्नत
को
जमीं
पर
ही
बना
दें
जिससे,
फ़र्जी
जन्नत
के
ख़्यालों
से
ही
कुछ
चैन
मिले.
१०
फंस
गए
होते
जो
कांटों
में
हम
गए
होते,
चमन
के
जाल
से
हम
कैसे
बच
गए
होते,
ख़ैर
तो
ये
है
कि
कांटों
को
भी
ख़ुशबू
न
मिली,
वरना
हर
नाक
में
कुछ
ज़ख़्म
हो
गए
होते.
११
मैं
तो
इस
पार
हूं,
दरिया
का
है
गहरा
पानी,
इधर
की
उलझनों
में,
फंसी
मेरी
ज़िन्दगानी,
आऊंगा
उस
पार
मैं
भी
मिलेगी
फ़ुरसत
जिस
दिन,
अब
तो
बस
आ
जाओ
तुम
ही,
मत
करो
आनाकानी.
१२
पीने
वाले
चले
गए,
मयख़ाने
में
साक़ी
बचा,
और
सब
रंग
उड़
गए
बस
रंग
एक
ख़ाकी
बचा,
दिल
तो
टुकड़े-टुकड़े
कर
ग़ायब
किसी
ने
कर
दिया,
सीने
में,
उस
दिल
का
बस
एक
भूत
ही
बाक़ी
बचा.
१३
ज़ुबां
थी
बन्द
पर
आंखों
ने
सब
कुछ
बोल
दिया,
पलक
पर
बिठा,
अपने
प्यार
को
भी
तोल
दिया,
देखकर
उसको
मैंने
दिल
तो
संभाला,
लेकिन,
थरथराते
हुए
होठों
ने
राज़
खोल
दिया.
१४
जो
मिल
जाते
हैं,
नहीं
रहते
हमेशा
पास
यहां,
इसी
से
होता
है,
मन
मेरा
बहुत
उदास
यहां,
वक़्त
ने
सख़्त
क़िलों
को
भी
खंडहर
कर
डाला,
तेरे
नाज़ुक
बदन
को
ढकने
को
लिबास
कहां?
१५
बहार
आई
तो
गुलशन
में
खिली
रंगीं
कली,
शराब
आई
तो
तबियत
हर
एक
की
मचली,
हुस्न
ने
जब
किसी
की
ओर
देखा
प्यार
से,
उसे
तो
लगा
जैसे
ज़मीं
पर
जन्नत
मिली.
१६
मुसीबत
आई
पर
कोई
न
अपने
साथ
हुआ,
इसी
ख़याल
से
दिल
मेरा
बहुत
उदास
हुआ,
बहार
आई
और
चली
गई,
पता
न
चला,
ख़िजा
के
आने
पर
इसका
मुझे
अहसास
हुआ,
१७
दौर
आने-जाने
के
हैं
चल
रहे,
सभी
हो
मजबूर
इसको
सह
रहे,
इसके
पीछे
कोई
ताक़त
है
छुपी,
इस
लिये
इन्सान
कुछ
नहीं
कह
रहे,
१८
ग़ैर
की
बगिया
में
ही
सब
गुल
खिले,
कहें
किससे,
हाय!
हम
अपने
गिले,
आशियाने
के
लिए
हमको
यहां,
दिल
चुभा
दें,
एसे
कुछ
कांटे
मिले.
१९
किनारे
देखते
हैं
जिस
तरह
से
लहरों
को,
उस
तरह
देखते
थे
हम
हसीन
चहरों
को;
लहर
की
तरह
चहरे
हुए
ग़ायब
पानी
में,
देखते
रहे
हम
दरिया
के
राज़
गहरों
को.
२०
न
आए
जिनको
अपना
वायदा
निभाना
था,
न
ला
पाए
जो
एक
मेहमान
घर
में
लाना
था,
हाथ
में
रह
गया
अपने
ही
हाथों
का
लिखा,
एक
पैग़ाम
जो
महबूब
तक
पहुंचाना
था.
२१
नाज़ुक
है
दिल
की
हालत,
कहीं
टूट
ना
जाए,
दामन
किसी
की
याद
का,
कहीं
छूट
ना
जाए,
देख
कर
रंज
मेरा,
लोग
अब
यह
कह
रहे,
इसे
सहरा
में
भेजो,
आंसुओं
में
डूब
ना
जाए,
२२
मिला
है
हुस्न
जिसे
वो
यहां
कंगाल
नहीं,
किया
है
इश्क़
जिसने,
उसका
बुरा
हाल
नहीं.
रंग
हाथों
में
आया,
मेरे
ही
ख़ून-ए-जिगर
से,
रंग
वरना
हिना
का
इतना
ज़ियादा
लाल
नहीं.
२३
ज़िन्दगी
रात-दिन
बस
करवटें
बदलती
रही,
हम
थे
ख़ामोश,
ज़माने
की
बात
चलती
रही;
जहां
में
इश्क
की
हमने,
मिसाल
क़ायम
की,
न
हुआ
राख
परवाना,
शमा
भी
जलती
रही.
२४
षौक़
से,
चाहो
तुम
तो,
मेरा
इम्तहां
लेना,
पास
हो
जाऊं
तो,
सौ
फ़ीसदी
नम्बर
देना,
आग
से
खेल
रहा
हूं,
अगर
मैं
जल
जाऊं,
अपने
क़दमों
से
मेरी
राख
को
ठोकर
देना.
२५
चमन
दुनिया
में
देखो
और
उनमें
गुलाब
देखो,
हसीनों
की
अदायें
देखो,
उनमें
शबाब
देखो;
बिना
इनके
मज़ा
कुछ
भी
नहीं
है
ज़िन्दगी
में,
न
देखो
गर
हक़ीक़त
में
तो
इनके
ख़्वाब
देखो.
२६
सामने
आंख
के
जो
है,
वही
सब
कुछ
नहीं
है,
छुपा
एक
नूर
है
जो
दिखाई
देता
नहीं
है;
देखना
चाहते
हो
तुम
अगर
उसका
जलवा,
बन्द
आंखें
करो,
अन्दर
है
वो
बाहर
नहीं
है.
२७
किनारा
दूर
है,
दरिया
का
गहरा
पानी
है,
अपनी
कश्ती
भी
तो
उस
पार
तक
पहुंचानी
है,
मुझको
दरिया
में
एसे
हाल
में
लाने
वाले,
तेरे
सहारे
पर
ही
मेरी
ज़िन्दगानी
है.
२८
ख़ुशी,
ग़म
दोनों
से
ही
दोस्ती
की
है
मैंने,
फूल,
कांटों
के
साये
ज़िन्दगी
जी
है
मैने;
क़लम
ख़्यालों
का
डुबा,
अंधेरे
की
स्याही
में,
शायरी
रोशनी
के
काग़ज़ों
पर
की
मैंने.
२९
जब
कभी
परी
चेहरा
याद
आता,
ज़हन
में
फूल
बनकर
मुस्कराता,
चन्द
लम्हात
देकर
कुछ
तसल्ली,
मुझे
ग़मगीन
ही
वो
छोड़
जाता,
३०
अपने
ख़्वाबों
में
जब
तुझको
पाया,
लगा
ऐसा
कि
मैं
तेरा
साया,
ख़्याल
के
साथ
चाहत
भी
है
तेरी,
ज़हन,
दिल
दोनों
पर
है
तू
छाया.
३१
कुछ
न
चाहा,
मगर
चाहा
तुझको,
इसी
चाहत
ने,
उभारा
मुझको;
पाऊंगा
तुझको,
इस
उम्मीद
पर,
ज़िन्दगी
में
मिली
राहत
मुझको,
३२
ख़ुशी
के
गीत
हम
सब
मिल
के
गायें,
मिठाई
खायें,
औरों
को
खिलायें,
दिवाली
पर
जलायें
दीप
ऐसे,
दिमाग़
और
दिल
सभी
के
जगमगायें.
३३
बना
के
अपना
क्यों
समझा
पराया?
उठा
के
ज़मीं
से,
फिर
क्यों
गिराया?
जलाना
था
तो
मेरा
घर
जलाते,
करके
आबाद
दिल
को
क्यों
जलाया?
३४
हर
नई
चीज़
क़ुदरत
से
निकलती,
बहते
दरिया
में
जैसे
लहर
चलती,
मौत
से
आत्मा
नहीं
ख़त्म
होती,
सिर्फ़
वो
तो
लिबासों
को
बदलती.
३५
बू-ए-गुल
हवा
में
बसती
है
जैसे,
नूर
में
किरन
भी
छुपती
है
जैसे,
बूंद
दरिया
में
जैसे
महव
होती,
रूह
भी
ख़ुदा
में
मिलती
है
वैसे.
३६
रात
के
चांद
और
तारों
से
पूछो,
खिलते
फूलों
की
बहारों
से
पूछो,
सबको
रोशन
उसी
का
नूर
करता,
चाहो
तो
जलते
अंगारों
से
पूछो.
३७
जो
बिछड़े,
लौट
कर
नहीं
आये,
खो
गए
अंधेरे
में
सब
साये;
अब
तो
ख़तरा
बहार
से
मुझको,
राह
में
कांटे
ना
बिछा
जाये.
३८
सुकूं
है
प्यार
की
निगाहों
में,
घनी
जुल्फ़ों
में,
गुदाज़
बांहों
में,
जिसे
नसीब
न
हो
यह
यह
आलम,
क्यों
न
डूबे
वो
गहरी
आहों
में.
३९
हाल
बतलाऊं
क्या
तनहाई
का,
सख़्त
अंजाम
तेरी
जुदाई
का,
ज़िन्दगी
रात
है
मावस
की
कड़वी,
बनके
पूनम
ला
थाल
मिठाई
का.
४०
किसी
की
याद
में
आंसू
बहाये,
अकेले
बैठकर
मातम
मनाये,
अंधेरा
छा
गया
जब
ज़िन्दगी
में,
शायरी
के
दिये
हमने
जलाये.
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