| ||||||||||||||||||
|
ज़ीरो की कुण्डलियां
कवि की चाह कविता सुनिये ध्यान से, हो चाहे बिलकुल बोर, सुन कर बस कह दीजिये, बहुत खूब! वन्स मोर! बहुत खूब! वन्स मोर! अगर यह नहीं होता है, बेचारा कवि अन्दर ही घुट कर रोता है. कह ज़ीरो, यदि कवि को हो जाये बीमारी, दवा यही, कवि सम्मेलन की करो तैयारी. ० लिपि लिपि भाषा का रूप है, नहीं है उस की जान, जो अटके हैं रूप पर, करते हैं अपमान. करते हैं अपमान, तो भाषा शर्माती है, नीचे तहख़ाने में जाकर छुप जाती है. कह ज़ीरो, आओ भाषा को सरल बनायें, आये सब की समझ, उसी लिपि में लिखवायें. ० एड्स बीमारी देखी सुनीं, हैज़ा, ताउन, कोढ़, किन्तु आजकल एड्स की, बीमारी बेजोड़. बीमारी बेजोड़, किसी को यह लग जाये, आत्म-ग्लानि और सैक्स-हानि से चैन न पाये. कह ज़ीरो कविराय, मर्द हो या हो नारी, दोनों का विनाश करती है यह बीमारी. ०
प्रेम और गणित योगेश्वर जब कर रहे, अपनी नियमित भक्ति, अनुराधा के रूप में, आई शिव की शक्ति. आई शिव की शक्ति, प्रेम-बन्धन में बांधा, बोली तुम हो शून्य, शून्य का हूं में आधा. कह ज़ीरो कविराय, गणित का ग्यान मिल गया, और भक्ति करने का भी वरदान मिल गया. ०
अंक गणना अंक गण्ना से आज कल, सिद्ध करें सब काज, किन्तु इसी से सत्य के, छिपते हैं कुछ राज, छिपते हैं कुछ राज, देख कर इस का छलना, बिकिनी से अक़्सर करते हैं इस की तुलना. कह ज़ीरो, बिकिनी लगभग सब अंग दिखाती, किन्तु जिस्म के मुख्य अंग को वह ढक जाती. ०
बिना वस्त्र के बचने घर की तपन से, सोते बाहर लोग, सजनी को भी जून में, लगता है यह रोग. लगता है यह रोग, मगर कहती, डरते हैं, सारी रात गगन से तारे क्यों गिरते हैं? कह ज़ीरो, घायल करती हो बिना शस्त्र के, कोठे पर सोया न करो तुम बिना वस्त्र के. ०
तब और अब तब तो घूंघट देख कर, जग उठता था प्यार, श्रंगारी कविताओं की, होती थी भरमार. होती थी भरमार, कल्पना पर आधारित, जिस को सुन कर सब होते थे बहुत प्रभावित. कह ज़ीरो, अब तन पर वस्त्र बहुत ही थोड़ा, कवियों की कल्पना के लिये, कुछ नहीं छोड़ा. ०
साड़ी सूडानी महिलाओं की, देखी जब पोशाक़, एक दम साड़ी सी लगी, कैसा ये इत्तिफ़ाक़. कैसा ये इत्तिफ़ाक़, मगर ये समझ न आई, साड़ी की ही तरह क्यों नहीं ये बंधवाई. कह ज़ीरो, पूछा, साड़ी क्यों नहीं बंधवातीं? बोलीं, पेट दिखाने से हम हैं शर्मातीं. ०
कमर नहीं है ऊपर से नीचे तलक, ढके हुये सब अंग, किन्तु बीच की कमर तो, रहती बिल्कुल नंग. रहती बिल्कुल नंग, यही तो समझ न आई, इतनी नाज़ुक जगह, क्यों नहीं यह ढकवाई. कह ज़ीरो, इस पहनावे का राज़ बतायें, कहते "कमर नहीं है", फिर क्या उसे छिपायें. ०
छिपे सत्य जो नहीं है वह दीखता, यह तो बड़ा कमाल, आंखों के आगे लगे, है माया का जाल, है माया का जाल, सत्य गहरा, या ऊंचा, जिसने खोजा सत्य, वही मन्ज़िल तक पहुंचा. कह ज़ीरो कविराय, भेद अब समझ में आया, छिपे हुये हैं सत्य, दिखाई देती माया. ०
छाले वाली आयेगी अब कौनसी राधा मेरे पास, इसी बात को सोच कर, होते क्रिश्ण उदास. होते क्रिश्ण उदास, रो रहे फूट फूट कर, हो गये हैं अब कांटा वो तो सूख सूख कर. कह ज़ीरो, कांटे की प्यास तभी जायेगी, छालों का दिल लेकर जब राधा आयेगी. ०
दिल दिल का अजीब हाल है, दिल की उल्टी बात, दिल देकर यह कह रहे, "तड़पत हैं दिन रात." "तड़पत हैं दिन रात", मगर कैसे होता है, दिल ही नहीं रहा तो दर्द कहां होता है? कह ज़ीरो कविराय, मामला यह मुश्किल का, दिल को देकर क्यों पड़ता है दौरा दिल का. ०
प्रेम प्रेम दूर से कीजिये, हीरो हो या हूर, आकर्शण उन में अधिक, जो रहते हैं दूर. जो रहते हैं दूर, पाप से बच जाते हैं, किया देह सम्पर्क, एड्स में फंस जाते हैं. कह ज़ीरो कविराय, बात यह मान लीजिये, यदि करना ही पड़े, दूर से प्रेम कीजिये. ०
आधी शादी शादी करने के लिये, युवक हुआ तैयार, इधर उधर डाली नज़र, देखे कुछ अखबार. देखे कुछ अखबार, अन्त में बोला मुझ से, आधी शादी तय हो गई है हीरोइन से. कह ज़ीरो, पूछा उस से, आधी क्या बाक़ी? बोला, मेरी ओर से पक्की, उधर की बाक़ी. ०
गौल्फ़ गौल्फ़ खेलने पति गये, पत्नी हुई उदास, छै घन्टे के वास्ते, पति न रहेंगे पास. पति न रहेंगे पास, तो बकबक कौन सुनेगा, तबियत हुई खराब, दवाई कौन करेगा. कह ज़ीरो कविराय, पड़ रहे दु:ख झेलने, जब से पति हैं लगे हमारे गौल्फ़ खेलने. ०
प्रेम रस पहले जब पति लौटता, कर के बाहर काम, पत्नी से घर में उसे मिलता था आराम. मिलता था आराम, प्रेम धारायें बहतीं, जिस से दोनों की इच्छायें पूरी होतीं. कह ज़ीरो, अब तो पत्नी भी काम पै जाये, आयें दोनों थके, प्रेम रस कौन पिलाये? ०
तलाक़ तलाक़ का एक फ़ैसला, जज ने दिया निकाल, पति-पत्नी के बीच में, बंट जाये सब माल. बंट जाये सब माल, मगर यह नहीं विचारा, बच्चे उन के तीन, करें कैसे बंटवारा, कह ज़ीरो, पत्नी बोली, अब घर जायेंगे, एक और बच्चा पैदा कर तब आयेंगे. ०
18 प्रेम डगर फूल मान लो शूल को, तभी मिलेगा चैन, वरना इस सन्सार में, रो-ओगे दिन रैन. रो-ओगे दिन रैन, रूप कब पीछा छोड़े, दिल को घायल करे और सब अंग मरोड़े. कह ज़ीरो, यह बात कठिन, पर सरल जान लो, प्रेम डगर में कांटों को भी फूल मान लो. ०
सुख दुख सुख दुख दोनों हैं यहां, इन से बचता कौन, कभी हंस रहे खिलखिला, कभी रो रहे मौन. कभी रो रहे मौन, ज़िन्दगी चलती जाती, कभी चांदनी रात, कभी अंधियारी आती. कह ज़ीरो, दोनों अपनी रंगत दिखलाते, खिलते कभी गुलाब कभी कांटे चुभ जाते. ०
सुनसान रहते हम सुनसान में, तड़प रहे दिन रात, किसकी हम बातें सुनें, किसे सुनायें बात. किसे सुनायें बात, पास कोई नहीं आये, देख हमारा हाल, सभी हम से कतराये. कह ज़ीरो कविराय, तरस दिखलाने वाले, रोये अपने साथ, फूट कर, दिल के छाले. ०
आदि कम्प्यूटर स्रिष्टि से पहले ब्रह्म था, कम्प्यूटर का रूप, उस में एक और शून्य के, बसे थे बिट्स अनूप. बसे थे बिट्स अनूप, स्रष्टि जब चाही रचना, विस्फोटन से भौतिक रूप दिखाया अपना. कह ज़ीरो, एक और शून्य जगती में आये, प्रक्रिति, पुरुष दोनों के जिन में रूप दिखाये. ०
कम्प्यूटर घर में कम्प्यूटर लगौ, रखै पिया कू संग, चैन न पल भर लैन दे, लड़ै दिमागी जंग. लड़ै दिमागी जंग, गणित के खेल खिलावै, खान पान भुलवाय अनोखी कला दिखावै. कह ज़ीरो कविराय, पड़ी पत्नी बिस्तर में, कोसत, भयौ अनर्थ आ गई सौतन घर में. ०
कम्प्यूटर अवतार कलयुग में क्या हो रहा, इस पर किया विचार, जग में कितने पाप हैं, कौन करे उद्धार. कौन करे उद्धार, सब अपनी बात गढ़ रहे, "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि" का श्लोक पढ़ रहे. कह ज़ीरो कविराय, निराश न हो इस युग में, कम्प्यूटर अवतार आ गये हैं कलयुग में. ०
कम्प्यूटर गुरू कम्प्यूटर में गुण बहुत, मिल्ता इस से ग्यान, इस में इतनी कुशलता, देते सब सम्मान. देते सब सम्मान, फिरें सब पीछे, आगे, जिसे न इस का ग्यान, दूर वह इस से भागे. कह ज़ीरो कविराय, बना यह सच्चा ट्यूटर, सब हैं इस के चेले, गुरु है बस कम्प्यूटर ०
कम्प्यूटर संस्क्रिति कम्प्यूटर को देख कर, चकित हो रहे लोग, घर, दफ़्तर या स्कूल में, है इन का उपयोग. है इन का उपयोग, फ़ैसले ये ही करते, मानवगण तो इन में केवल डेटा भरते. कह ज़ीरो, मन से भी चंचल है इन की गति, ये मशीन ही नहीं, आज कल ये हैं संस्क्रिति. ०
शिव और कम्प्यूटर शिव में शक्ति समाई है, इस का सब को ग्यान, अर्ध नारीश्वर है बना, उन का रूप महान. उन का रूप महान, बसे जिसमें नर, नारी, एक, शून्य का होता मिलन बहुत सुखकारी. कह ज़ीरो, शिवजी अब कम्प्यूटर बन आये, जिस में एक, शून्य के अनुपम बिट्स समाये. ०
कुर्सी कलाकार जब व्यस्त था, करता घर में काम, रोज़गार के रूप में, मिल गया उसे इनाम, मिल गया उसे इनाम, लगा वह आफ़िस जाने, किन्तु लगा वह इधर उधर सब वक़्त गंवाने. कह ज़ीरो, उस से मिलने की मुश्किल पड़ गई, कैसे ठहरे एक जगह, जब कुर्सी मिल गई. ०
काग़ज़ दफ़्तर के संसार में, काग़ज़ हैं सब ओर, कब इन से पीछा छुटे, लगा रहे हैं ज़ोर. लगा रहे हैं ज़ोर, मगर कुछ कर नहीं पाते, काग़ज़ के दलदल में नीचे धंसते जाते. कह ज़ीरो, काग़ज़ से अपनी जान छुड़ाओ, जलवा दो या फूंक मार कर इन्हें उड़ाओ. ०
ईश्वर का पता मांगा मन्दिर में बहुत, मिला सिर्फ़ अपमान, मस्जिद के भी साम्ने, मिला नहीं कुछ दान, मिला नहीं कुछ दान, मगर एक मयख़ाने में, दिये नोट पर नोट वहां पीने वालों ने. कह ज़ीरो कविराय, बहुत नटखट हो ईश्वर, पता कहीं का देते, रहते और कहीं पर. ०
कांटा सूखा कांटा पेड़ पर, तकता है आकाश, अपनी हालत देख कर, होता बहुत उदास, होता बहुत उदास, पास कोई नहीं आया, धूल, हवा औ' धूप से पीड़ित उस की काया. कह ज़ीरो कविराय, किसी ने दुख नहीं बांटा, साथ दे रहा उस का, एक दूसरा कांटा. ०
लिंग भेद मिनिस्ट्री स्त्रीलिंग है, मन्त्रालय पुल्लिंग, नहीं जानते असल में, क्या है उसका लिंग. क्या है उसका लिंग, हमने तो स्त्री माना, मिनिस्ट्री कहकर ही बस उसको पहचाना. कह ज़ीरो, जब चिट्ठी का उत्तर नहीं पाते, समझ मौन नारी का, "हां" का अर्थ लगाते. ०
शराबी पूजा में क्या शक्ति है, इस का किया बखान, पूजा से पर्वत हिलें, मिलें सभी वरदान. मिलें सभी वरदान, शराबी ने नहीं माना, पूजा से पीना बहतर, इस को सच जाना. कह ज़ीरो, पूजा में सिर्फ़ पुजारी झूमे, पीकर प्याला देखो सारा मन्दिर घूमे. ०
बाज़ार जाते हैं बाज़ार से लेने को सामान, वहां एक ही चीज़ की, होतीं कई दुकान. होतीं कई दुकान, समझ में नहीं आता है, बेचारा ग्राहक इस से चकरा जाता है. कह ज़ीरो, जब हर दुकान पर चीज़ वही है, क्यों जाते उस जगह जहां पर भीड़ खड़ी है? ०
पार्टियां खाना पीना चल रहा, लोग हो रहे दंग, मस्ती के माहौल में ख़ूब आ रहा रंग. ख़ूब आ रहा रंग, बात सब यही कर रहे, बुरा पेट का हाल, दावतें बहुत चर रहे. कह ज़ीरो कविराय, रोज़ पार्टी में जाना, जीवन का उद्देश्य यहां बस पीना, खाना. ०
प्रवासी लौटेंगे निज देश को, पाकर कुछ धन-धाम, पांच बरस में पा लिये, विडियो, कार, मकान. विडियो, कार, मकान मिले, फिर मन में आई, एक लाख डालर लेकर जायेंगे भाई. कह ज़ीरो, जब एक लाख भी खरे हो गये, बोले, अब क्या जायें बच्चे बड़े हो गये. ०
ट्रान्स्फ़र तीन बरस अब हो गये, छोड़ेंगे यह देश, इस से सभी उदास हैं, होता सब को क्लेश. होता सब को क्लेश, मन भी कुछ भारी होता, कितनी जलदी बीत गये दिन, यक़ीं न होता. कह ज़ीरो, अब टूटेगा यह सुन्दर सपना, और कहीं पर शीघ्र लगेगा डेरा अपना. ०
जीवन जीवन तो शतरंज है, मानव हैं बस गोट, रात-दिनों के बोर्ड पर , खाते रहते चोट. खाते रहते चोट, उदासी इस से होती, नियति खिलाती खेल, हार मानव की होती. कह ज़ीरो कविराय, खेल में जीवन बीता, खाईं सब ने मातें, कोई भी ना जीता. ०
ईश्वर की खोज जैसे सूरज में बसे, जग के सभी प्रकाश, ईश्वर के अन्दर बसे, सब धर्ती, आकाश. सब धर्ती, आकाश, उन्हें विवेक से जाना, जिसने उन्हें बनाया, उसे नहीं पहचाना. कह ज़ीरो कविराय, बुद्धि से ईश्वर पाना, जैसे दीपक से सूरज की खोज कराना. ०
सूफ़ी की प्रेमिका अजीब मेरी प्रेमिका, वार करे अति क्रूर, बद्ले अपने रूप को, लगे अटपटी हूर. लगे अटपटी हूर, मुझे अचरज है भारी, कैसे रक्खूं मेल, बड़ी चंचल यह नारी. कह ज़ीरो, जब सोऊं, बहुत दूर हो जाती, जब देखूं उठ जाग, मेरा अस्तित्व मिटाती. ०
बूंद और सागर सागर में बूंदें बसीं, उन का आदि न अंत, बूंदों में सागर बसा, कहते हैं यह संत. कहते हैं यह संत, भेद दोनों में ऐसा, आत्मा, परमात्मा में अन्तर होता जैसा. कह ज़ीरो, परमात्मा को आत्मा में पाते, जैसे बूंदों द्वारा सागर देखे जाते. ०
|
|