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महाभारत
सूची भीष्म पर्व ८९८ [भीष्म पर्व - १] कुरुक्शेत्र में उभय पक्श के सैनिकों की स्थिति तथा युद्ध के नियमों का निर्माण. ८९९ [भीष्म पर्व - २] वेद व्यास जी के द्वारा संजय को दिव्य द्रिष्टि का दान तथा भयसूचक उत्पादों का वर्णन. ९०० [भीष्म पर्व - ३] व्यासजी के द्वारा अमंगल सूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्शणों का वर्णन. ९०१ [भीष्म पर्व - ४] धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय के द्वारा भुमि के महत्व का वर्णन. ९०२ [भीष्म पर्व - ५] पंचमहाभूतों के तथा सुदर्शन द्वीप का संक्शिप्त वर्णन. ९०३ [भीष्म पर्व - ६] सुदर्शन के वर्ष, पर्वत, मेरुगिरि, गंगानदी तथा शाशाकृति का वर्णन. ९०४ [भीष्म पर्व - ७] उत्तर कुरु, भद्राश्ववर्ष तथा माल्यवान का वर्णन. ९०५ [भीष्म पर्व - ८] रमणक, हिरण्यक, श्रिंगवान पर्वत तथा एरावतवर्ष का वर्णन. ९०६ [भीष्म पर्व - ९] भारतवर्ष की नदियों देशों तथा जनपदों के नाम और भूमि का महत्व. ९०७ [भीष्म पर्व - १०] भारतवर्ष में युगों के अनुसार मनुष्यों की आयु तथा गुणों का निरूपण. ९०८ [भीष्म पर्व - ११] शकद्वीप का वर्णन. ९०९ [भीष्म पर्व - १२] खुश, क्रौश्च और पुष्कर आदि द्वीपों का तथा राहु, सूर्य एवम चन्द्रमा के प्रमाण का वर्णन. ९१० [भीष्म पर्व - १३] संजय का युद्धभूमि से लौटकर धृतराष्ट्र को भीष्म की म्रित्यु का समाचार सुनाना. ९११ [भीष्म पर्व - १४] धृतराष्ट्र का विलाप करते हुए भीष्मजी के मारे जाने की घटना को विस्तारपूर्वक जानने के लिए संजय से प्रशन करना. ९१२ [भीष्म पर्व - १५] संजय का युद्ध के व्रितांत का वर्णन आरम्भ करना, दुर्योधन का दुशासन को भीष्म की रक्शा के लिए समुचित व्यवस्था करने का आदेश. ९१३ [भीष्म पर्व - १६] दुर्योधन की सेना का वर्णन. ९१४ [भीष्म पर्व - १७] कौरवमहारथियों का युद्ध के लिए आगे बढ़ना तथा उनके व्यूह, वाहन और ध्वज आदि का वर्णन. ९१५ [भीष्म पर्व - १८] कौरव सेना का कोलाहल तथा भीष्म के रक्शकों का वर्णन. ९१६ [भीष्म पर्व - १९] व्यूह निर्माण के विषय में युधिष्ठिर और अर्जुन की बातचीत, अर्जुन द्वारा वज्रव्यूह की रचना, भीम की अयक्शता में सेना का आगे बढ़ना. ९१७ [भीष्म पर्व - २०] दोनों सेनाओं की स्थिति तथा कौरवसेना का अभियान. ९१८ [भीष्म पर्व - २१] कौरवसेना को देखकर युधिष्ठिर का विषाद करना और श्री कृष्ण की कृपा से ही विजय होती है यह कहकर अर्जुन का उन्हें आश्वासन देना. ९१९ [भीष्म पर्व - २२] युधिष्ठिर की रणयात्रा, अर्जुन और भीम की प्रशंसा तथा श्री कृष्ण का अर्जुन से कौरवसेना को मारने के लिए कहना. ९२० [भीष्म पर्व - २३] अर्जुन के द्वारा दुर्गा देवी की स्तुति, वर प्राप्ति और अर्जुनकृत दुर्गास्तवन के पाठ की महिमा. ९२१ [भीष्म पर्व - २४] सैनिकों के हर्ष और उत्साह के विषम में धृतराष्ट्र और संजय का संवाद. ९२२ [भीष्म पर्व - २५] दोनों सेनाओं के प्रधान- प्रधान वीरों एवम शंखध्वनि का वर्णन तथा स्वजनवध के पाप से भयभीत हुए अर्जुन का विषाद. ९२३ [भीष्म पर्व - २६] अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करते हुए भगवान के द्वारा नित्यानित्य वस्तु के विवेचन पूर्वक, सांख्ययोग कर्मयोग एवम स्थितप्रज्ञ की स्थिति और महिमा का प्रतिपादन. ९२४ [भीष्म पर्व - २७] ज्ञानयोग और कर्मयोग आदि समस्त साधनों के अनुसार कर्तव्य कर्म करने की आवश्यकता का प्रतिपादन एवम स्वधर्मपालन की महिमा तथा कामनिरोध के उपाय का वर्णन. ९२५ [भीष्म पर्व - २८] सगुण भगवान के प्रभाव, निष्काम कर्मयोग तथा योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा का वर्णन करते हुए विविध यज्ञों एवम ज्ञान की महिमा का वर्णन. ९२६ [भीष्म पर्व - २९] सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग, ज्ञान योग एवम भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन. ९२७ [भीष्म पर्व - ३०] निष्काम कर्मयोग का प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धार के लिए प्रेरणा तथा मनोनिग्रह पूर्वक ध्यानयोग एवम योगभ्रष्ट की गति का वर्णन. ९२८ [भीष्म पर्व - ३१] ज्ञान विज्ञान, भगवान की व्यापकता, अन्य देवताओं की उपासना एवम भगवान को प्रभाव सहित न जानने वालों की निन्दा और जानने वालों की महिमा का कथन. ९२९ [भीष्म पर्व - ३२] ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर एवम भक्तियोग तथा शुक्ल और कृष्ण मार्गों का प्रतिपादन. ९३० [भीष्म पर्व - ३३] ज्ञान विज्ञान और जगत की उत्पत्ति का आसुरी और दैवी सम्पदा वालों का, प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का, सकाम निष्काम उपासना का एवम भगवद्भक्ति की महिमाका वर्णन. ९३१ [भीष्म पर्व - ३४] भगवान की विभूति और योगशक्ति का तथा प्रभाव सहित भक्तियोग का कथन, अर्जुन के पूछने पर भगवान द्वारा अपनी विभूतियों का और योगशक्तियों का पुन: वर्णन. ९३२ [भीष्म पर्व - ३५] विश्वरूप का दर्शन कराने के लिए अर्जुन की प्रार्थना, भगवान की संजय द्वारा विश्वरूप का वर्णन, अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना, भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति प्रार्थना, भगवान की विश्वरूप और चतुर्भुज रूप के दर्शन की महिमा और केवल अनन्यभक्ति से ही भगवान की प्राप्ति का फल. ९३३ [भीष्म पर्व - ३६] साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय तथा भगवत्प्राप्ति के उपाय का एवम भगवत्प्राप्ति वाले पुरुषों के लक्शणों का वर्णन. ९३४ [भीष्म पर्व - ३७] ज्ञान सहित क्शेत्र क्शेत्रज्ञ और प्रकृति पुरुष का वर्णन. ९३५ [भीष्म पर्व - ३८] ज्ञान की महिमा और प्रकृति पुरुष से जगत की उत्पत्ति का, सत्व, रज, तम तीनों गुणों का भगवत्प्राप्ति के उपाय एवम गुणातीत पुरुष के लक्शणों का वर्णन. ९३६ [भीष्म पर्व - ३९] संसार व्रिक्श का, भगवत्प्राप्ति के उपाय का, जीवात्मा का, प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का एवम क्शर, अक्शर और पुरुषोत्तम के तत्व का वर्णन. ९३७ [भीष्म पर्व - ४०] फल सहित दैवी और आसुरी सम्पदा का वर्णन तथा शास्त्र विपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्र के अनुकूल आचरण करने के लिए प्रेरणा. ९३८ [भीष्म पर्व - ४१] श्रद्धा का और शस्त्र विपरीत घोर तप करने वालों का वर्णन, आहार, यज्ञ, तप और दान के प्रिथक प्रिथक भेद तथा ओम तत, सत के प्रयोग की व्याख्या. ९३९ [भीष्म पर्व - ४२] त्याग का सांख्यसिद्धान्त का, फल सहित वर्ण धर्म का उपासना सहित ज्ञान निष्ठा का भक्ति सहित निष्काम कर्मयोग का एवम गीता के माहात्म्य का वर्णन. ९४० [भीष्म पर्व - ४३] गीता का माहात्मय तथा युधिष्ठिर का भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य से अनुमति लेकर युद्ध के लिए तैयार होना. ९४१ [भीष्म पर्व - ४४] कौरव पाण्डवों के प्रथम दिन के युद्धका आरम्भ. ९४२ [भीष्म पर्व - ४५] उभयपक्श के सैनिकों का द्वन्द्व युद्ध. ९४३ [भीष्म पर्व - ४६] कौरव पाण्डव सेना का घमासान युद्ध. ९४४ [भीष्म पर्व - ४७] भीष्म के साथ अभिमन्यु का भयंकर युद्ध, शल्य के द्वारा उत्तर कुमार का वध और श्वेत का पराक्रम. ९४५ [भीष्म पर्व - ४८] श्वेत का महाभंयकर पराक्र्म और भीष्म के द्वारा उसका वध. ९४६ [भीष्म पर्व - ४९] शंख का युद्ध, भीष्म का प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिन के युद्ध की समाप्ति. ९४७ [भीष्म पर्व - ५०] युधिष्ठिर की चिन्ता, भगवान श्री कृष्ण द्वारा आशवासन, धृष्टद्युम्न का उत्साह तथा द्वितीय दिन के युद्ध के लिए क्रौश्चारुण व्यूह का निर्माण. ९४८ [भीष्म पर्व - ५१] कौरव सेना की व्यूह रचना तथा दोनों दलों में शंखध्वनि और सिंहनाद. ९४९ [भीष्म पर्व - ५२] भीष्म और अर्जुन का युद्ध. ९५० [भीष्म पर्व - ५३] धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्य का युद्ध. ९५१ [भीष्म पर्व - ५४] भीमसेन का कलिंगों और निषादों से युद्ध, भीम के द्वारा शक्रदेव, भनुमान और केतुमान का वध तथा उनके बहुत से सैनिकों का संहार. ९५२ [भीष्म पर्व - ५५] अभिमन्यु और अर्जुन का पराक्रम तथा दूसरे दिन के युद्ध की समाप्ति. ९५३ [भीष्म पर्व - ५६] तीसरे दिन कौरव पाण्डवों की व्यूह रचना तथा युद्ध का आरम्भ. ९५४ [भीष्म पर्व - ५७] उभयपक्श की सेनाओं का घमासान युद्ध. ९५५ [भीष्म पर्व - ५८] पाण्डव वीरों का पराक्रम, कौरव सेना में भगदड़ तथा दुर्योधन और भीष्म का संवाद. ९५६ [भीष्म पर्व - ५९] भीष्म का पराक्रम, श्री कृष्ण का भीष्म को मारने के लिए उद्यत होना, अर्जुन की प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरवसेना की पराजय, त्रितीय दिवस के युद्ध की समाप्ति. ९५७ [भीष्म पर्व - ६०] चौथे दिन दोनों सेनाओं का व्यूह निर्माण तथा भीष्म और अर्जुन का द्वैरथ युद्ध. ९५८ [भीष्म पर्व - ६१] अभिमन्यु का पराक्र्म और धृष्टद्युम्न द्वारा शल के पुत्र का वध. ९५९ [भीष्म पर्व - ६२] धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्श के वीरों का युद्ध तथा भीम के द्वारा गजसेना का संहार. ९६० [भीष्म पर्व - ६३] युद्धस्थल में प्रचण्ड पराक्रमकारी भीम का भीष्म के साथ युद्ध तथा सात्यकि और भुरिश्रवा की मुठभेड़. ९६१ [भीष्म पर्व - ६४] भीमसेन और घटोत्कच का पराक्रम, कौरवों की पराजय तथा चौथे दिन के युद्ध की समाप्ति. ९६२ [भीष्म पर्व - ६५] धृतराष्ट्र संजय संवाद के प्रसंग में दुर्योधन के द्वारा पाण्डवों की विजय का कारण पूछने पर भीष्म का ब्रह्मा जी के द्वारा की हुए भगवत स्तुति का कथन. ९६३ [भीष्म पर्व - ६६] नारायणावतार श्री कृष्ण एवम नरावतार अर्जुन की महिमा का प्रतिपादन. ९६४ [भीष्म पर्व - ६७] भगवान श्री कृष्ण की महिमा. ९६५ [भीष्म पर्व - ६८] ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्री कृष्ण और अर्जुन की महत्ता. ९६६ [भीष्म पर्व - ६९] कौरवों द्वारा मकरव्यूह तथा पाण्डवों द्वारा श्येनव्यूह का निर्माण एवम पांचवें दिन के युद्ध का आरम्भ. ९६७ [भीष्म पर्व - ७०] भीष्म और भीम का घमासान युद्ध. ९६८ [भीष्म पर्व - ७१] भीष्म, अर्जुन आदि योद्धाओं का घमासान युद्ध. ९६९ [भीष्म पर्व - ७२] दोनों सेनाओं का परस्पर घोर युद्ध. ९७० [भीष्म पर्व - ७३] विराट भीष्म, अश्वत्थामा, अर्जुन, दुर्योधन भीम तथा अभिमन्यु और लक्शम्ण के द्वन्द्व युद्ध. ९७१ [भीष्म पर्व - ७४] सात्यकि और भुरिश्रवा का युद्ध, भुरिश्रवा द्वारा सात्यकि के दस पुत्रों का वध, अर्जुन का पराक्रम तथा पांचवें दिन के युद्ध का उपसंहार. ९७२ [भीष्म पर्व - ७५] छठे दिन के युद्ध का आरम्भ, पाण्डव तथा कौरवसेना का क्रमश: मकरव्यूह एवम क्रैश्चव्यूह बनाकर युद्ध में प्रिव्रित्त होना. ९७३ [भीष्म पर्व - ७६] धृतराष्ट्र की चिन्ता. ९७४ [भीष्म पर्व - ७७] भिमसेन, धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्य का पराक्रम. ९७५ [भीष्म पर्व - ७८] उभय पक्श की सेनाओं का संकुल युद्ध. ९७६ [भीष्म पर्व - ७९] भीमसेन के द्वारा दुर्योधन की पराजय, अभिमन्यु और द्रौपदी पुत्रों का धृतराष्ट्र पुत्रों के साथ युद्ध तथा छठे दिन के युद्ध की समाप्ति. ९७७ [भीष्म पर्व - ८०] भीष्म द्वारा दुर्योधन को आश्वासन तथा सातवें दिन के युद्ध के लिए कौरव सेना का प्रस्थान. ९७८ [भीष्म पर्व - ८१] सातवें दिन के युद्ध में कौरव पाण्डव सेनाओं का मण्डल और बज्रव्यूह बनाकर भीषण संघर्ष. ९७९ [भीष्म पर्व - ८२] श्री कृष्ण और अर्जुन से डरकर कौरव सेना में भगदड़, द्रोणाचार्य और विराट का युद्ध, विराट पुत्र शंक का वध, शिखण्डी और अश्वत्थामा का युद्ध, सात्यकि के द्वारा अलम्बुष की पराजय, धृष्टद्युम्न के द्वारा दुर्योधन की हार तथा भीम और कृतवर्मा का वध. ९८० [भीष्म पर्व - ८३] इरावान के द्वारा विन्द और अनुविन्द की पराजय, भगदत्त से घटोत्कच का हारना तथा मद्रराज पर नकुल और सहदेव की विजय. ९८१ [भीष्म पर्व - ८४] युधिष्ठिर से राजा श्रुतायुका का पराजित होना, युद्ध में चेकितान और कृपाचार्य का मूर्छित होना, भुरिश्रवा से धृष्टकेतु और अभिमन्यु से चित्रसेन आदि का पराजित होना एवम सुशर्मा आदि से अर्जुन का युद्धरम्भ. ९८२ [भीष्म पर्व - ८५] अर्जुन का पराक्रम, पाण्डवों का भीष्म पर आक्रमण, युधिष्ठिर का शिखण्डी को उपालम्भ और भीम का पुरुषार्थ. ९८३ [भीष्म पर्व - ८६] भीष्म और युधिष्ठिर का युद्ध, धृष्टद्युम्न और सात्यकि के साथ बिन्द और अनुविन्द का संग्राम, द्रोण आदि का पराक्र्म और सातवें दिन के युद्ध की समाप्ति. ९८४ [भीष्म पर्व - ८७] आठवें दिन व्यूहबद्ध कौरव पाण्डव सेनाओं की रणयात्रा और उनका परसपर घमासान युद्ध. ९८५ [भीष्म पर्व - ८८] भीष्म का पराक्रम, भीम के द्वारा धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध तथा दुर्योधन और भीष्म की युद्धविषयक बातचीत. ९८६ [भीष्म पर्व - ८९] कौरव पाण्डव सेना का घमासान युद्ध और भयानक जनसंहार. ९८७ [भीष्म पर्व - ९०] इरावान के द्वारा शकुनि के भाइयों का तथा राक्शस अलम्बुष के द्वारा इरावान का वध. ९८८ [भीष्म पर्व - ९१] घटोत्कच और दुर्योधन का भयानक युद्ध. ९८९ [भीष्म पर्व - ९२] घटोत्कच का दुर्योधन एवम द्रोण आदि प्रमुख वीरों के साथ भयंकर युद्ध. ९९० [भीष्म पर्व - ९३] घटोत्कच की रक्शा के लिए आये हुए भीम आदि शूरवीरों के साथ कौरवों का युद्ध और उनका पलायन. ९९१ [भीष्म पर्व - ९४] दुर्योधन और भीम का एवम अश्वत्थामा और राजा नील का युद्ध तथा घटोत्कच की माया से मोहित होकर कौरव सेना का पलायन. ९९२ [भीष्म पर्व - ९५] दुर्योधन के अनुरोध और भीष्मजी की आज्ञा से भगदत्त का घटोत्कच, भीम और पाण्डव सेना के साथ घोर युद्ध. ९९३ [भीष्म पर्व - ९६] इरावन के वध से अर्जुन का दु:खपूर्ण उद्गार, भीम के द्वारा धृतराष्ट्र के नौ पुत्रों का वध, अभिमन्यु और अम्बष्ठ का युद्ध, युद्ध की भयानक स्थिति का वर्णन तथा आठवें दिन के युद्ध का उपसंहार. ९९४ [भीष्म पर्व - ९७] दुर्योधन का अपने मंत्रियों से सलाह करके भीष्म से पाण्डवों को मारने अथवा कर्ण को युद्ध के लिए आज्ञा देने का अनुरोध करना. ९९५ [भीष्म पर्व - ९८] भीष्म का दुर्योधन को अर्जुन का पराक्रम बताना और भयंकर युद्ध के लिए प्रतिज्ञा करना तथा प्रात:काल दुर्योधन के द्वारा भीष्म की रक्शा की व्यवस्था. ९९६ [भीष्म पर्व - ९९] नवें दिन के युद्ध के लिए उभयपक्श की सेनाओं की व्यूहरचना और उनके घमासान युद्ध का आरम्भ तथा विनाशसूचक उत्पातों का वर्णन. ९९७ [भीष्म पर्व - १००] द्रौपदी के पांचों पुत्रों और अभिमन्यु का राक्शस अलम्बुष के साथ घोर युद्ध एवम अभिमन्यु के द्वारा नष्ट होती हुई कौरवसेना का युद्ध भुमि से पलायन. ९९८ [भीष्म पर्व - १०१] अभिमन्यु के द्वारा अलम्बुष की पराजय, अर्जुन के साथ भीष्म का तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्य के साथ सात्यकि का युद्ध. ९९९ [भीष्म पर्व - १०२] द्रोणाचार्य और सुशर्मा के साथ अर्जुन का युद्ध तथा भीम के द्वारा गजसेना का संहार. १००० [भीष्म पर्व - १०३] उभयपक्श की सेनाओं का घमासान युद्ध और रक्तमयी रणनदी का वर्णन. १००१ [भीष्म पर्व - १०४] अर्जुन के द्वारा त्रिगर्तों की पराजय, कौरव पाण्डव सैनिकों का घोर युद्ध, अभिमन्यु से चित्रसेन की, द्रोण से द्रुपद की और भीम से बाह्यीक की पराजय तथा सात्यकि और भीष्म का युद्ध. १००२ [भीष्म पर्व - १०५] दुर्योधन का दुशासन को भीष्म की रक्शा के लिए आदेश, युधिष्ठिर और नकुल सहदेव के द्वारा शकुनि की घुड़सवार सेना की पराजय तथा शल्व के साथ उन सबका युद्ध. १००३ [भीष्म पर्व - १०६] भीष्म के द्वारा पराजित पाण्डव सेना का पलायन और भीष्म को मारने के लिए उद्यत हुए श्री कृष्ण को अर्जुन का रोकना. १००४ [भीष्म पर्व - १०७] नवें दिन के युद्ध की समाप्ति, रात में पाण्डवों की गुप्त मंत्रणा तथा श्री कृष्ण सहित पाण्डवों की भीष्म से मिलकर उनके वध का उपाय जानना. १००५ [भीष्म पर्व - १०८] दसवें दिन उभयपक्श की सेना का रण के लिए प्रस्थान तथा भीष्म और शिखण्ढी को भीष्म का समागम एवम अर्जुन का शिखण्डी को भीष्म का वध करने के लिए उत्साहित करना. १००६ [भीष्म पर्व - १०९] भीष्म और दुर्योधन का संवाद तथा भीष्म के द्वारा लाखों सैनिकों का संहार. १००७ [भीष्म पर्व - ११०] अर्जुन के प्रोत्साहन से शिखण्डी का भीष्म पर आक्रमण और दोनों सेनाओं के प्रमुख वीरों का परस्पर युद्ध तथा दुशासन का अर्जुन के साथ घोर युद्ध. १००८ [भीष्म पर्व - १११] कौरव पाण्डव पक्श के प्रमुख महारथियों के द्वन्द्व युद्ध का वर्णन. १००९ [भीष्म पर्व - ११२] द्रोणाचार्य का अश्वत्थामा को अशुभ शकुनों की सूचना देते हुए उसे भीष्म की रक्शा के लिए धृष्टद्युम्न से युद्ध करने का आदेश देना. १०१० [भीष्म पर्व - ११३] कौरव पक्श के दस प्रमुख महारथियों के साथ अकेले घोर युद्ध करते हुए भीम का अद्भुत पराक्रम. १०११ [भीष्म पर्व - ११४] कौरवपक्श के प्रमुख महारथियों के साथ युद्ध में भीम और अर्जुन का अद्भुत पुरुषार्थ. १०१२ [भीष्म पर्व - ११५] भीष्म के आदेश से युधिष्ठिर का उन पर आक्रमण तथा कौरव पाण्डव सैनिकों का भीषण युद्ध. १०१३ [भीष्म पर्व - ११६] कौरव पाण्डव महारथियों के द्वन्द्व युद्ध का वर्णन तथा भीष्म का पराक्रम. १०१४ [भीष्म पर्व - ११७] उभय पक्श की सेनाओं का युद्ध, दुशासन का पराक्रम तथा अर्जुन के द्वारा भीष्म का मूर्च्छित होना. १०१५ [भीष्म पर्व - ११८] भीष्म का अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव सेना का भीषण संहार. १०१६ [भीष्म पर्व - ११९] कौरव पक्श के प्रमुख महारथियों द्वारा सुरक्शित होने पर भी अर्जुन का भीष्म को रथ से गिराना, शरशय्या पर भीष्म के समीप हंसरूप धारी रिषियों का आगमन एवम उनके कथन से भीष्म का उत्तरायण की प्रतीक्शा करते हुए प्राण धारण करना. १०१७ [भीष्म पर्व - १२०] भीष्म जी की महत्ता तथा अर्जुन के द्वारा भीष्म को तकिया देना एवम उभय पक्श की सेनाओं का अपने शिविरों में जाना और श्री कृष्ण युधिष्ठिर संवाद. १०१८ [भीष्म पर्व - १२१] अर्जुन का दिव्य जल प्रकट करके भीष्म जी की प्यास बुझाना तथा भीष्म जी का अर्जुन की प्रशंसा करते हुए दुर्योधन से संधि के लिए समझाना. १०१९ [भीष्म पर्व - १२२] भीष्म और कर्ण का रहस्यमय संवाद.
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