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ऋषि पब्लिक स्कूल, ऋषिकेश में
हिन्दी दिवस (२१.०८.२००४) पर
पढ़ी गयी कुछ हिन्दी कवितायें
हमारी हिन्दी
(दिक्षा बिजलवाण, क्लास-५च)
हिन्दी भाषा इतनी सरल है
कोई एक प्रदेश नहीं है,
सभी जगह घूमा करती है,
सिर्फ़ एक ही देश नही है.
लिये एक सन्देश घूमती
भारत के हर प्रदेश में
मिलन बनाना चाहती है
दुनिया के देश-देश में.
भाग्यशालिनी है इतनी
सभी देशों का प्यार पा रही
अब तो जग के देश-देश में
सचमुच ये उपकार पा रही.
सभी भाषाएं प्यारी बहनें
सबका स्नेह मिला करता है
सबकी उन्नति देख-देख कर
मानस कमल खिला करता है.
०
कायर मत बन
(आराधना शुक्ला, क्लास-५च)
कुछ भी बन बस कायर मत बन
ठोकर मार पटक मत माथा
तेरी राह रोकते पाहन
कुछ भी बन बस कायर मत बन.
तेरी रक्षा का न मोल है
पर तेरा मानव अनमोल है
यह मिटता है वह बनता है
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को
कर न दुष्ट को आत्म समर्पण
कुछ भी बन बस कायर मत बन.
०
टेसू राजा
लेखक: रामधारी सिंह दिनकर
(आनन्य भट्ट, क्लास-५च)
टेसू राजा अड़े खड़े
मांग रहे हैं दही बड़े
बड़े कहां से लाऊं मैं
पहले खेत खुदाऊं मैं
उस में उर्द लगाऊं मैं
फ़सल काट कर लाऊं मैं
छांट फटक रखवाऊं मैं
फिर पिट्ठी पिसवाऊं मैं
टिक्की गोल बनाऊं मैं
बेलन से बिलवाऊं मैं
फिर पानी में डाल उन्हें
मैं लूं खूब उबाल उन्हें
फूल जायें वह सब के सब
उन्हें दही में डालूं तब
मिर्च नमक छिड़काऊं मैं
चांदी वरक़ लगाऊं मैं
चम्मच एक मंगाऊं मैं
तब वह उन्हें खिलाउं मैं
टेसू राजा अड़े खड़े
मांग रहे हैं दही बड़े
०
मेरी अभिलाषा है
(ननेय चौरस, क्लास-५अ)
सूरज सा दमकूं मैं
चंदा सा चमकूं मैं
झिलमिल-झिलमिल, उज्जवल-उज्जवल
तारों सा दमकूं मैं
मेरी अभिलाषा है
फूलों सा महकूं मैं
विहंगों सा चहकूं मैं
गुंजित कर वन उपवन
कोयल सा कुहकूं मैं
मएरी अभिलाषा है
नभ से निर्मलता लूं
शशि से शीतलता लूं
धरती से सहन शक्ति
पर्वत से द्रिढ़ता लूं
मेरी अभिलाषा है.
मेघों सा मिट जाऊं
सागर सा लहराऊं
सेवा के पथ पर मैं
सुमनों सा बिछ जाऊं
मेरी अभिलाषा है
०
पुष्प की अभिलाषा
लेखक: माखन लाल चतुर्वेदी
(प्रतीची सिंह, क्लास-५ब)
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊं
चाह नहीं प्रेमी माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊं
चाह नहीं सम्राटो के
शव पर, हे हरि! डाला जाऊं
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊं.
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक
मात्रभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक.
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